क्यों पीछे रह गया किसान - 3
क्या एमएसपी से सुधरेगी किसानों की हालत? क्या एमएसपी का कानून मुमकिन है?
किसानों की समस्यायों पर चर्चा करते हुए हमनें
क्यों पीछे रह गया किसान -1
में किसानों की माली हालत से रूबरू कराया, उसके बाद
क्यों पीछे रह गया किसान - 2
में आपको किसानों के साथ होते अन्याय का आभास कराया।
अब हम इस भाग में देखेंगे उन संभावित उपायों को भी जिनके जरिए किसानों के साथ हो रहे अन्याय को रोका जा सकता है।
कैसे रुकेगा यह अन्याय?
ऐसे में अगर आप चाहते है कि किसान किसानी करता रहे, उसे भी थोड़ा बहुत मुनाफा मिलता रहे तो या आपको यह व्यवस्था बदलनी पड़ेगी,
- किसान को लागत के सामान बेचने वाली कंपनियों, खाद, बीज, मशीन आदि बेचने वाली कंपनियों को निर्देशित किया जाए कि वो अपना उत्पाद थोक के भाव पर ही बेचे, जो कि बिल्कुल संभव नहीं है।
- किसानों से फसल खुदरा भाव पर खरीदी जाएं यानी कि फसल पर एमएसपी जैसा कुछ निश्चित किया जाए, हालाकि आज जो एमएसपी है वो भी थोक का भाव ही है लेकिन इस तरह कुछ हद न्याय हो सकता है। ये मुमकिन हो सकता है, हमारे किसान इसी की मांग कर रहें हैं।
या इस व्यवस्था से कोई छेड़छाड़ किए बगैर किसानों को नुकसान कि भरपाई के लिए सब्सिडी प्रदान करनी पड़ेगी, जो कि विश्व के ज्यादातर देश कर रहे हैं। अगर किसानों के साथ अन्याय वाली व्यवस्था जारी रहती है तो ऐसे में उन्हें सब्सिडी देना हमारा दायित्व भी है और किसानों का अधिकार भी।
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सब्सिडी नहीं वाजिब दाम दो!
लेकिन अगर इस पर किसानों की राय ली जाए तो ज्यादातर मामलों में उनका कहना होता है कि उन्हें सब्सिडी आदि की कोई जरूरत नहीं अगर उन्हें अपनी फसलों के वाजिब दाम मिल जाएं।

अगर आप हिंदुस्तान के परिपेक्ष में किसानों की इन समस्यायों के निवारण के बारे में भी सोच रहें हैं तो आपको इस समस्या की गंभीरता से ही समझ आ गया होगा कि सब्सिडी या एमएसपी में बड़े इजाफे के अलावा कोई भी प्रयास बेमानी ही रहेगा। अगर हम सोचते है हम कोई ऐसी नीति लाए जिससे 10 साल बाद किसान का हाल थोड़ा सुधरेगा तो भी हम उसके साथ अन्याय ही कर रहे हैं।
एमएसपी ही है उपयुक्त विकल्प:-
सब्सिडी वाला विकल्प हमारे देश के लिए इतना उपयुक्त नहीं है क्योंकि हमारे यह किसानों की संख्या दूसरे देशों की तुलना में ज्यादा है और सरकारी खजाना कम है।
एमएसपी ही ऐसी स्तिथि में एक क्रांतिकारी उपाय बन सकता है जो जल्द जल्द किसानों के साथ हो रहे अन्याय को रोकेगा और उनकी आर्थिक स्थिति भी बदलेगा। आज जिन राज्यों में एमएसपी का प्रावधान है वह किसानों के हालात बेहतर है।
एफडीआई (भारतीय खाद्य निगम) के आंकड़ों से पता चलता है पंजाब, हरियाणा में 80 से 90 प्रतिशत किसान एमएसपी पर फसल बेचते हैं जबकि पूरे देश का औसत 6 प्रतिशत है, इसके बाद केरल में भी किसानों को निर्धारित कीमतें मिलती हैं।
"एमएसपी है इसलिए आय भी ज्यादा"
उधर नाबार्ड के सर्वे में सामने आता है पंजाब मे एक औसत किसान परिवार की मासिक आय करीब 23 हज़ार रुपए सामने है, इसके बाद हरियाणा है जहां 18 हज़ार रुपए आय और उसके बाद केरल है जहां 16 हज़ार रुपए आय है। चौथे नंबर जो राज्य आता है वो है गुजरात जहां किसान परिवार की मासिक आय 11,800 रुपए है जो पंजाब से लगभग आधी है, बाकी देश का औसत 6,000 रुपए है।

यह तो जाहिर है एमएसपी किसानों के लिए सही विकल्प है, लेकिन यह भी बहस का मुद्दा हो सकता है। दरअसल आज एमएसपी केवल सरकारी खरीद पर ही मिलती है और सरकार इतना ही खरीद सकती है।
लेकिन विकल्प यह भी है कि सरकार कानून के जरिए निजी खरीदारों को भी एमएसपी पर खरीदने के लिए बाध्य कर दे या सरकार खुद खरीदने बेचने का काम करे। इसमें कुछ रुकावटें आ सकती है कुछ के हल हमारे पास होंगे, कुछ के शायद बाद में मिल जाएंगे। लेकिन जरूरी है इस निवारण पर गौर किया जाए, हो सकता है इससे हमारे किसानों- गांवों की तस्वीर ही बदल जाए और हमारी यह व्यवस्था विश्वभर में किसानों के लिए उदाहरण बने।
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